कि गुम है इंसान इन दिनों
०००
जीते जी कब किसी को नज़र मे रखती है
बाद मरने के ये दुनिया खबर मे रखती है
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कुछ भी कहा , न कुछ भी सुना
क्या-क्या कह-सुन वो गए है
घरों मे घरों जैसी बात नहीं अब
कहीं छत तो कहीं इंसान नहीं अब
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अच्छे लोग भटकते नही रात को
फिर ये चांद भटकता क्यों है
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