27 May 2007

Poetry 1

जहाँ भर की लो तलाशी
कि गुम है इंसान इन दिनों


०००


जीते
जी कब किसी को नज़र मे रखती है
बाद मरने के ये दुनिया खबर मे रखती है

०००

कुछ भी कहा , न कुछ भी सुना
क्या-क्या कह-सुन वो गए है


०००


घरों मे घरों जैसी बात नहीं अब
कहीं छत तो कहीं इंसान नहीं अब


०००

अच्छे लोग भटकते नही रात को

फिर ये चांद भटकता क्यों है

०००



Poetry 2

हाथों मे हसरतों के खिलौना है आदमी
देखिए यूं तो आज भी बौना है आदमी
०००


जूड़ा खोल ज़ुल्फ़ें शाने पे आई होगीं
बदलियाँ यूं ही न आसमां पे छाई होगीं


Poetry 3

दुआ किसी को मिलती है
दवा किसी को मिलती है

गुनाह कोई करता है
सज़ा किसी को मिलती है


पैदा हो इससे पहले ही
कज़ा किसी को मिलती है