27 May 2007

Poetry 2

हाथों मे हसरतों के खिलौना है आदमी
देखिए यूं तो आज भी बौना है आदमी
०००


जूड़ा खोल ज़ुल्फ़ें शाने पे आई होगीं
बदलियाँ यूं ही न आसमां पे छाई होगीं


No comments: