27 May 2007

Poetry 1

जहाँ भर की लो तलाशी
कि गुम है इंसान इन दिनों


०००


जीते
जी कब किसी को नज़र मे रखती है
बाद मरने के ये दुनिया खबर मे रखती है

०००

कुछ भी कहा , न कुछ भी सुना
क्या-क्या कह-सुन वो गए है


०००


घरों मे घरों जैसी बात नहीं अब
कहीं छत तो कहीं इंसान नहीं अब


०००

अच्छे लोग भटकते नही रात को

फिर ये चांद भटकता क्यों है

०००



No comments: